बचपन के वे दिन सारे
लौट कर नहीं आते हैं
बुढ़ापे की स्मृति में भी
कौंध कौंध जाते हैं।
सेन्टर ऑफ एट्रैक्शन रहना
भरे पूरे परिवार का
मेरी इच्छा का ध्यान रखना
सबके प्रेमिल व्यवहार का।
क्या खाती क्या न खाती
क्या ज़्यादा पसन्द करती
कौन सा रंग फबता इसपर
चोटी कैसी अच्छी लगती।
दादी ,माँ,चाची,बुआ सब
आपस में डिसकस करती
तैयार कैसे करना है इसको
नये नये तरीक़े अपनाती।
लगता था रानी हूँ कहीं की
सबलोग ख़िदमत में खडे
कुछ नई बात सीख ली तो
अचंभित होते सब बडे।
मेरी पसन्द की चीजें
हर पल घर में रहती थी
क्या देने से खा लेगी
परस्पर कहती रहती थी।
बड़ी बच्ची होने के कारण
बहुतेरा प्यार पाती रही
परिवार के सब लोगों की
आँख का तारा बनी रही।
पाठा दूध या चूडा दही
खाती थी बड़े मन से
पर वफ होने के बाद
भाग जाती थी किचन से।
कहती पेट बोल दिया बस
अब न खा पाऊंगी
दोस्त खड़े हैं खेलने को
मैं तो बाहर जाऊँगी।
नहीं भूलती आज भी मैं
नानी माँ का अपार दुलार
धुर छुतहरी कह कर बांधना
बिखरे केशों को बार बार।
पढना ,लिखना,नाचना,गाना
ककहरा औ भजन कीर्तन
एक ही कथा को रोज़ सुनना
चिडिया औ राजा का वचन।
गौरैया ,कौआ,तोता,मैंना
धीरे -धीरे सब पहचानना
जब आंगन में आ जाते तो
सबको बुला कर दिखलाना।
नक़ल करना कोयल की
कुहु -कुहु मीठी आवाज की
कभी मंद कभी तीव्र स्वर में
वाणी मृदु भाषी कोयल की।
उन्मुक्त गगन,स्नेहिल पवन
उल्लसित चिन्ता मुक्त मन
बीते हुए सुनहले दिन अब
नहीं आयेंगे इस जीवन ।
विद्या
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