देव वैद्य धनवन्तरि प्रगट हुए
कार्तिक त्रयोदशी के दिन
अमृत कलश लेकर आये
दूर करने देवों के दुर्दिन ।
महर्षि दुर्वासा के शाप से
हुए थे देव गण शक्ति हीन
शरणागत हुए श्री विष्णु के
असुर आतंक से थे अति दीन।
स्थिति देख कहा प्रभु ने उन्हें
निराश नहीं हों आप लोग
सशक्त होने केलिये कर
लीजिये कुछ नया उद्योग ।
समर्थन लेकर असुरों का
कीजिये सागर का मंथन
अमृत निकलेगा उससे पी
तोडिये दीनता का बंधन।
सहमति बनी दोनों पक्षों में
तैयारी प्रारंभ हो गई
आधार मथानी रज्जु सब चीजें
एकत्रित की जाने लगीं।
श्री विष्णु ने कच्छप बन कर
मथानी मंदार को धारण किया
बासुकि नाग को रज्जु बना कर
दोनों पक्षों ने मंथन शुरू किया।
चौदह रत्न निकले मंथन से
अंततःदेव वैद्य धन्वन्तरि निकले
लिये हाथ में अमृत कलश
देव असुर सब हर्षाये।
बनकर धन्वन्तरि वहाँ पर
श्री विष्णु ही आये थे फिर
मोहिनी बन कर उन्होंने
उनके विवाद को निबटाये थे।
प्राकट्य दिवस है धन्वन्तरि का
आज धनतेरस का शुभ दिन
सोना ,चांदी, वर्तन ख़रीदने का
सुख आरोग्य मांगने का दिन।
इनका पवित्र कलश प्रतीक है
ऐश्वर्य,संपदा,सम्पन्नता का
धातु पात्र क्रय करना शुभता
प्रतीक बना माँ लक्ष्मी का।
कर सफ़ाई दीपक जला कर
आरोग्य समृद्धि की याचना करते
दुख दारिद्रय को दूर करने हेतु
प्रभु धन्वन्तरि का आह्वान करते।
विद्या
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