vidus

Eternal Learner

अकेला पन

खा जाता है आनंद को

उमंग भरे परिवेश को

हंसी खुशी बतकही मस्ती

स्नेह के भावावेश को ।

सब चले जाते है जब

सबको तो जाना ही है

बैठ अकेली दीवारें

देख दिन बिताना ही है ।

अंतरनाद करता है मन

स्वयं संवाद करता है

अनुभूति की दुनिया में

अनेक फरियाद करता है।

कुरेदता अतीत के पल

बरसों पहले या बीते कल

खुशनुमा बातें याद आतीं

चिंतन कर मुस्काता भी है।

है करूण क्षण जब कौंधता

याद आतीं सारी बातें

हृदय विगलित मन कंपित हो

विलख विलख रोता भी है।

अकेलापन देता मनको

खुली छूट विचरने की

मान अपमान दुख सुख

स्मरण कर कचोटता भी है।

सुनता मन के अंधेरे की

छोटी छोटी सिसकियां

अनेक अनुगूंज सुनकर

यूं कभी घबराता भी है।

अकेलापन भोग समझता

गहरी है मन की दुनिया

भीड भरे जग में रह कर

कोई समझ नपाता है।

अवसाद की ओर ठेलता

समूह से कटा व्यवहार

अंतर्द्वन्द संसार के अंदर

डूबता उतराता भी है ।

विद्या

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