काल के थपेडों को सहते सहते
दादी अस्सी की हुई
अब वह अकेले भिक्षाटन
नहीं कर सकेगी इसीलिये
फुलवा आता है साथ
वह आशा भरी निगाहों से
ताकता है दानियों की ओर
उसे पैसे से अधिक रोटियां
भाती हैं ,पैसे तो मां ले लेती है
घर चलाने के लिये
उसके हिस्से आती है
एक या दो रोटियां
जबकि प्लेटफार्म पर मिली
रोटियां सिर्फ दादी पोते के हिस्से आती है
जिस दिन मिल जाता है /बासी बची रोटी ,पूडी ,भाजी
पराठे,नमकीन,गुमसाया दालमोठ
वही दिन उसका उत्सव है
दोनों खूब स्वाद लेकर खाते हैं
और नलके का पानी पी कर
छाया में विश्राम करते हैं
फुलवा को अपनी दादी पर गर्व है
उसका सहारा बनने से आराम से
पेट भर जाता है घर की चिल्लपों
और टंडेली से निजात मिल जाता है
कभी जब कुछ नहीं मिलता है
दादी उसे घर पर एक रोटी अधिक
दिलाने का वादा करती है
विद्या
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