Do you remember life before the internet?
हां मुझे इन्टरनेट से पहले की जिन्दगी अच्छी तरह याद है।1959 में जब मेरी उम्र पांच वर्ष थी तभी मेरी मां का देहांत हुआ था मेरे पापा आरा में नौकरी करते थे और मां नानी के घर नाथनगर में रहती थी ।मृत्यु के एक दिन पहले पापा मां को देख कर आरा गये थे दूसरे दिनउनकी मृत्यु होने के बाद पापा को आने में देर होगी यह सोच कर उस जमाने में मेरी मां को मुखाग्नि मुझसे ही दिलवाया गया था ।इतना ही नहीं 1989तक तो मेरे घर में टेलीफोन तक नहीं था पति की पोस्टिंग गोहाटी थी पन्द्रह पन्द्रह दिन में चिटठी आती थी आवश्यक होने पर बूथ पर या पडोस में जाकर बात करना पडता था।पर उस समय सामाजिकता ज्यादा थी प्रायःरोज लोग एक दूसरे घर मिलने बैठने गप करने जाते थे ।शाम में भी आस पडोस में घर की बनी डिशों के आदान प्रदान का रिवाज था ।कह सकते हैं कि जीवंत जीवन था कोई औपचारिकता नहीं थी ।गर्मियों में बरी पारने ,आचार डालने ,सिलाई करने का न्योता दिया जाता था आज इसके कल उसके घर फिर बरसात में बरामदे पर झूले लगते थे सब साथ मिल मिल कर झूलते और गीत गाते थे जाडे में अलाव तापना और स्वेटर बुनना सगल था यानी हर मौसम में किसी न किसी बहाने मिलना जुलना होता रहता था चाहे लडाई करने के लिये ही क्यों नहीं ।इन्टरनेट आने पर अनेक तरह की सुविधाएं तो मिली हैं पूरे विश्व से क्षण में कनेक्ट कर सकते हैं पर ये एकाकी पन फोन की दोस्ती परिजनों के बीच जो संवादहीनता की दीवार खडी हो गई है वो मेरी दृष्टि में सामूहिकता का विनाश कर रही है ।अब पति पत्नी मां बेटे पिता पुत्र भाई बहन भी परस्पर बात चीत करने के लिये सोचते हैं कि उसके पास टाइम होगा कि नहीं होगा ।सामाजिकता का निर्वाह कैसे हो इसके लिये आज विद्वजनों को सोचना होगा ।
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