vidus

Eternal Learner

“विज्ञापन”

बाजार की भाषा विज्ञापन

अनुभव को उत्तेजना बनाता

संवेदना से मतलब नहीं है

न तो लाभ हानि का ही है ।

बाजारीकरण उपभोक्तावाद

को असली जामा पहनाता है

जो दिखता है वही बिकता है

इसी को वो सिद्ध करता ।

अंग प्रदर्शन मस्त अदाऐं

खुला पन की परा काष्ठा है

अनेककम्पनी के ढेर सारे

तरह तरह के प्रोडक्ट दिखाता है।

जनता को नित है भरमाता

भांति भांति के फेशवाश बॉडी वाश

पाउडर हैंड वाश शैम्पू क्रीम सब

स्क्रीन पर है लाते जाता ।

इससे बढ जाता है ग्लो

झूर्रियां आतीं बिलकुल स्लो

केश कभी ना उजले होते

बॉडी चमकती जैसे स्नों।

सारे क्रीम गोरा बनाते

त्वचा को चिकना कोमल बनाते

सुन्दर बनने के लिये युवा वृद्ध

सब इन चीजों को अपनाते।

रेटिंग चलती हाई एंड लो

कुछ पल में कर जातीं फ्लो

गंजों के सिर बाल उगाते

फिर कंघी उसे बेच आते ।

विज्ञापन का बाजार गर्म है

देने वालों को न शर्म है

पैसा पैसा पैसा के ऊपर

लाज वाज छोडना धर्म है।

विद्या

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