vidus

Eternal Learner

“अस्सी वर्ष गुजर गये हैं”

अनुभव की अग्नि में तप कर

ऊंचे नीचे पथ चल कर

झेल के झंझावातों को

मान अपमान घातों को ।

अस्सी वर्ष गुजर गये हैं

हाथ पांव कंपन करते हैं

सर हिलता रहता इक ओर

पांव न रहते सही ठौर।

फिर भी मन मस्तिष्क सजग है

स्मृति जागृत प्राण स्थिर है

जीवन की सारी बातें

चिंतन में जुगाली करते हैं।

पढ लिख कर अफसर बनना

कार्य कर जीविका पाना

पाल पोस कर बच्चों को

अपने पैरों पर खडा करना ।

अब हाशिये में पड गया

मुख्य धारा से दूर पडा

खाना पीना सोना सब

दुष्कर कर्म ही बन गया ।

बिना किसी सहयोग के

कुछ भी नहीं कर पाता हूं

वस्त्र पहनने के लिये भी

राह देखता रह जाता हूं।

जितना ज्ञान प्राप्त किया

संग ही लेकर जाऊंगा

कोई पूछने भी आये

बता ही नहीं पाऊंगा ।

मां ने पहनाया था लंगोट

डगमग चलना सिखलाया था

फिर हगीज पर आगया हूं

लडखडाते चलता हूं ।

मानों एक वृत पर चलकर

फिर वहीं पर पहुंच गया हूं

नव गात पाने को दुबारा

लाइन में लगा हुआ हूं।

दिन गिन गिन रहता हूं

राह मृत्यु की तकता हूं

बिना कष्ट दिये आ जाये

इस काया से मुक्त कराये ।

विद्या

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