उमड घुमड कर आते बादल
जल भर भर कर लाते बादल
काले काले आये बादल
नीले नभ में छाये बादल।
धरती मां को उर्वर बनाते
अनाज फल फूल उगाते
वायु पंख पर उडते रहते
भ्रम चित्र भी बनाते रहते।
सरस लोगों की कल्पना को
मनमाना आकार देते
मिलन को प्रभावित करते
अनुराग रस रंग भरते ।
ज्यों धरती तृप्त होती
त्यों प्रेमी जन तृप्त होते
आसक्ति की मीठी बातें
घन संग में साझा करते।
विरह काल में स्मृति जगाते
प्रेमी प्रेमिका को तरसाते
विरही की पीडा बताते
दूत बन संदेश सुनाते।
भानु संग लुका छिपी चलता
किरणों को ढकता रहता
बहुत प्रकार से उड उडकर
अपना साम्राज्य फैलाता ।
सृष्टि के ये ही नायक हैं
वर्षा रानी के वाहक हैं
इन बिन बरसात न होती
भूमि भी उर्वरा न बनती।
कभी काले कभी सफेद
तडकती बिजली ध्वनि अनेक
शान्ति से अविरल रसधार
लघु बूंदें बरसाती प्यार।
मानों सागर का उधार
देना हो सौ गुना बार
अनवरत गिरती रस धार
परिपूर्ण हो जाता संसार।
विद्या
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