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Eternal Learner

“माया”

माया की माया माया ही जाने

माया की काया को कौन पहचाने

खेल खेलाती भ्रम में डुबाती

सबको लिप्त करती मनमाने।

आते कहां से हैं जाना कहां है

नहीं पता जीवन अनजाना है

कौन धुंधलके के पार देख पाये

भूल भुलैया का राज बता पाये ।

ये तो दिखा देती है झिलमिल रूप

विपुल धन दौलत शान शौकत अनूप

दे डालती अपना जटिल भ्रम जाल

काट ही नहीं सकता उसे महा काल।

कठपुतली हैं हम तो ब्रह्मा के कर में

नचा रहे जैसा ये नचाना चाहें

माया का जाल ले फेंकते जाते

उसमें ही उलझ पुलझ सब रह जाते।

ये तो नचाती जाती जग के जन को

मोह बासना जगाती उनके मन मे

क्रोध विषय काम में डुबाती जाती

अज्ञानता नदी में बहाती जाती।

पहचानना इसको तो बडा कठिन है

मानों भीषण जलधार मध्य जीवन है

छलने वाला है इन्द्र धनुषी रूप

लुभा रहा सबको याचक हो या भूप ।

आंख मूंद अनजाने मार्ग चलाती

चकमक रूप से ये लुभाती जाती

मुग्ध हो मानव धंसता चला जाता 

जीवन का सत्य पहचान नहीं पाता।

मन में है माया तन में है माया

जन्म मरण में है जीवन में है माया

माया है ओढना माया बिछौना

बडा दूभर है इसको दूर करना।

अगर इस माया से बचा लें काया

तभी इसको हम दूर कर सकेंगे

जीवन सत्य को सही में जान सकेंगे

परम ब्रह्म के रूप को पहचान सकेंगे ।

विद्या

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