निन्दा को भी रस की श्रेणी
दे दिया था सूरदास ने
पर निन्दा रसना की बात
लिख रखा है अपने पद में।
स्थायी भाव घृणा शिकवा
ताका झांकी विभाव है
चरित्र दोष बदनाम करना
इस रस का संचारी भाव है।
निन्दक की प्रशंसा की
कबीर ने भी अपने पद में
निन्दक नियरे राखिये कह
प्रतिष्ठा भर दी इस रस में ।
चुगली को महान बनाया
ब्रह्मा के पुत्र नारद ने भी
सातो लोक घूम घूम कर
लगाते रहे लुत्ती सब कहीं।
निन्दा करना भाता सबको
टाइम पास हो जाता है
मन में गुद गुदी होती
मजा भी आ जाता है ।
समय तो ऐसा कटता इसमें
कुछ भी पता नहीं चलता
जो दिन ऐसे भारी लगता
निन्दा से क्षण में उड जाता ।
ये रस झरता विपुलता से
तारतम्य टूटता ही नहीं
तन मन सराबोर होता
आनंद का तो अंत नहीं ।
इन्टरनेट के युग में भी
निन्दा करना आसान है
रील बना कुछ भी लिख देते
भुक्त भोगी परेशान हैं।
बदनामी से भी नाम होता
ये धारणा है बलवती
ऊटपुटांग हरकतें करके
सारे बन जाते भ्यूज वती।
जितना भ्यूज उतना पैसा
क्यों न निन्दा हम करें
चुगली शिकवा झूठ बोलकर
धनवान क्यों न बनें ।
सरे आम गालियां देकर
या निन्दा का अभिनय कर
आकर्षित करें समाज को
हाय हाय छीछी थूथू कर ।
आओ निन्दा करें परस्पर
मन की भडास निकल जाये
इसकी उसकी सबकी चुगली
कर लाइफ में सुकून पायें ।
विद्या
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