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Eternal Learner

“मैं और मेरा मेरा पन “

मैं जैसी हूं वैसी हूं

पर मेरा मेरा पन बदल गया

देख बैठ सोचती हूं कि

कैसे कैसे कब हुआ ।

बचपन में मैं थी नटखट

गुडिया उसके गहने सब

मेरी धरोहर सिमटी थी

विंदिया चूडी लहंगे तक।

कोई छू नहीं सकता था

मेरे खिलौने का बक्सा

नई नई गुडिया बनवा कर

करती रहती थी सुरक्षा।

बडी हुई छूटी गुडिया

ताम झाम विंदी जेवर

स्कूल ,कॉलेज ,विश्वलिद्यालय

बदल गये मेरे तेवर ।

मेरा पन फैला अब तो

डिग्री रिजल्ट कैरियर तक

अथक परिश्रम ,अति उत्साह

ले के नौकरी पाने तक।

नौकरी पाई सर्किल फैला

नये नये लोग मिलते गये

सहकर्मी ड्युटिअवकाश सब

मेरे पन की दुनिया बने।

फिर मेरा पन बदल गया

जीवन साथी मिलने पर

सास ससुर ननद देवर के

इस जीवन में आने पर।

नये रिश्ते बने लोग मिले

नई नई खुशियां आईं

बढा मेरा पन और आगे

नन्हीं सी विटिया आई।

घर बाहर दोनों तरफ

जिम्मेदारी बढती गई

नित आती रहीं चुनौतियां

जूझती रही घडी घडी।

दो कन्या दो पुत्र पाकर

धनवान मैं बन गई थी।

अब उनके बचपन के संग

खेल खेलती रहती थी।

बच्चो की जरूरत थी मैं

खाना पीना सोना खेल

आपस में लडते थे ये

पर मुझसे रहता था मेल।

अधेड उम्र होते होते

मेरापन फिर बदल गया

प्यारी मम्मी से मुझे

ग्रैंड मां का ओहदा मिला ।

नाती पोते बडे हुए फिर

रिटायरमेंट की बेला आई

मुख्य धारा से हटकर मैं

हाशिये में पहुंच गई।

आज मेरा पन पसरा है

छडी ,नकली दांत ,चश्में में

व्हील चेयर ,दवाई ,,मूव विक्स

धर्म की अनेक पुस्तकों नें ।

कुछ लिखती पढती रहती

कटता रहता अपना जीवन

यही कहानी है मेरी सदा

बदलता रहा मेरा मेरा पन ।

विद्या

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