कब खुश होते जटिल प्रश्न है
मुंडेर्मुंडे मतिर्भिन्न है
निर्धन अभाव में भी खुश हैं
महल वालों की मति खिन्न है।
कोई धनी कोई ज्ञानी
परोपकारी उदंड प्राणी
अपनी अपनी आदत से
करें व्यवहार मन मानी।
बढता जब बैंक बैलेंस
धनी तभी खुश होते हैं
हजार लाख करोड हों
तो अरबों के लिये रोते हैं ।
एकाउन्ट बढने पर वे
बहुत खुश होते हैं
दान करूणा संवेदना पर
आंख मूंद लेते हैं।
निर्धन का तो यही हाल है
खाना बनता बडी बात है
मजबूत कद काठी ले कर
श्रम करता बडी बात है ।
एक बेलून एक मिठाई से
ही जन्म दिन मन जाता है
मिट्टी के घर आंगन में
ठहाका लग जाता है।
बडी बडी पार्टी में वो
उतना खुश नहीं होते
अभिमान प्रदर्शन में डूबे
अपनी अकड में ऐंठे रहते।
पडोसी के घर मातम में
अंदर से खुश होते हैं
पर पीडा के आनंद में
डूब डूब रस लेते हैं।
अपनी चाहे एक फूट जाये
पर उसकी दोनों फूटे
ऐसे ही भावों के कारण
खुशियों के मानक टूटे ।
विद्या
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