पंच तत्व का पुतला मानव
जैसा भाव अपनाता है
वैसा उसका व्यक्तित्व बनता
समझ ही नहीं पाता है।
मानव रूप में जन्म ले
जैसा संस्कार पाता है
उसका व्यक्तित्व तदनुसार
बुरा भला बन जाता है।
एक ज्ञानी एक मूर्ख दोनों
शरीर रूप में एक हैं
ज्ञानेन्द्रियों कर्मेन्द्रियों से युक्त
रंग रूप रस गंध अनेक हैं।
क्रोध ,घृणा ,हिंसा ,दुष्टता
अहंकार, शान शौकत
व्यक्तित्व को बेकार बनाता
व्यर्थ सारा धन दौलत।
अन्तर्गुण का प्रतीक है
किसी का व्यवहार हाव भाव
सच्चे हृदय वाले कभी न
आपस में रखते दुराव।
क्रोध के बदले संयम हो
अहंकार के बदले विनम्र भाव
जो जितना सहज रहता
उसका बडा पडता प्रभाव।
बडा महीन सा अंतर है
ख्याति प्राप्त या कुख्यात में
एक सरल सहज स्वभाव
दूसरा परम दुष्ट परघाती भाव।
राजा हो कि रंक हो
भाव जिसके निःशंक हो
निडर हो करें वे कार्य
चरित्र जिसका निष्कलंक हो।
इसी मुख से व्यक्ति
मान सम्मान पाता है
और इसी मुख से वो
लात भी खा लेता है ।
अपना चरित्र कैसा बनायें
ये हमारे ऊपर है
मुझमें औ मेरे चरित्र में
कण मात्र का अंतर है।
शरीर तो सज जाता है
नवीन रंग विरंगे कपडे से
व्यक्तित्व सजाने के लिये
पूरा जीवन ही लगते।
तन सजाओ या न सजाओ
व्यवहार तो अपना सुधारो
जिसरूप में जहां भी जन्मे
चरित्र को जरूर निखारो।
जैसा स्वभाव बनाओगे
चरित्र वैसा ही बनेगा
तुमसे ज्यादा समाज में
तेरे चरित्र का महत्व है ।
मीठी वाणी सन्मार्ग पर चलना
परहित को धर्म समझना
बसुधैव कुटुम्बकम में विश्वास
जन कल्याण की जगा दे आस।
विद्या
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