रिश्ते उगते हैं रिश्ते मरते हैं
जिन्दगी ऐसे कटती जाती है
घेरा बना कर स्वार्थ का लोभ का
फिर ये रिश्ते मसल दिये जाते हैं।
विश्वास जब मरता है संदेह जन्मता
धीरे धीरे सम्बन्ध दम तोड देता है
कल्पना में पुराने संवाद तैरते रहते
पर संवाद हीनता जड जमा लेती है ।
प्यार भरा सम्बन्ध और अपनापन
टूटता जाता छाता परायापन
अपने होते पराये मुख मोड कर
भूल जाते बचपन का नटखट पन।
कटती नहीं थी शाम जिनके बिन
अब किसी याम नजर नहीं आते हैं
जीवन की खुशियां ,आनंद के पल
क्यों आज तिरोहित हुए जाते हैं।
सबसे बडा प्रतिरोध है बात नहीं करना
अपनों के बीच दीवार खडी होती है
मन सिर धुनता हृदय छटपटाता है
ऐसे वैसे ऊलूल जुलूल भाव आते हैं।
रिश्तो के मरने पर अपनापन खोता है
आंसू निकलते नहीं हृदय छटपटाता है
छोटे छोटे लाभ छोटी छोटी खुशियां
बिना जल के पौधे से सूख सूख जाते हैं।
रिश्तों के मरने का सबसे बडा लक्षण है
सामने मिलने पर भी बात नहीं करना
जहां बिन देखे दिन नहीं कटते थे
वहां अब सामने से मुख मोड जाना।
मानों इघर देख लेंगे गलती से वो
नफरत की दीवार टूट टूट जायेगी
बना कर इस दीवार को और ऊंचा
अपने क्रोध को बचाये रखना चाहते हैं।
छोटी सी बात का बडा प्रतिरोध
अहं में डूबे अकड दिखाते हैं
रिश्ते का मरना असर नहीं करता
घमंड में डूबे फूले न समाते हैं।
विद्या
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