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Eternal Learner

“जरूरत से जरूरी तक “

जरूरत पूरी होने के बाद

जरूरी का भ्रम पालते हैं

जीवन की सीधी राह पर

इच्छाओं के जंगल उगाते हैं।

जरूरत तो सीमित रहती

संतोष को पकडे रहती

मन सरोज बढने के साथ

जरूरी का क्षेत्र बढता जाता।

मिट्टी घर में रहने वाले जब

पक्के घर में आ जाते हैं

तब फ्रिज ,टीवी,कूलर ,फैन

एकदम जरूरी बन जाते हैं।

उससे भी आगे ज्यों ज्यों

आमदनी बढती जाती है

जरूरी चीजों की लिस्ट

बढती ही चली जाती है।

सायकिल ,रिक्शा,मोटर,कार

से हेलिकॉप्टर ,हवाईजहाज तक

आय में इजाफा के साथ साथ

एकदम जरूरी बनते जाते हैं।

जरूरत की जहां सीमा होती

जरूरी तो बिलकुल असीम है

अरब पति एलन मस्क के लिये

चांद पर फैक्टरी जरूरी है ।

बिना ड्राइवर की गाडी चलती

कृत्रिम मस्तिष्क वाला रिमोट

ब्रह्मा के सृजन से होड ले रहा

है आधुनिक मानव रोज।

सभ्यता के विकास के संग संग

जरूरी वस्तुओं की संख्या बढी

सिर्फ जरूरत से असंतुष्ट हम

सोपान दर सोपान चढते गये।

प्रेम, सम्मान ,रोटी ,मकान

सदव्यवहार आदान प्रदान

इन से अलग जो जरूरी हैं

वे जरूरी नहीं मन की उडान है

विद्या

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टिप्पणियाँ

2 responses to ““जरूरत से जरूरी तक “”

  1.  अवतार

    एकदम सही बात कही है आपने

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    1. Vidya Rani अवतार

      धन्यवाद

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