आंखों में अलसाई नींद
हाथों में आधी बोतल
लिये पडा था बेवडा
सडक किनारे ढेले पर ।
अभी अभी पौ फटी थी
सूरज निकला भी नहीं था
नींद पूरी नहीं हुई थी
वाहनों के हार्न से जगा था।
बनारस की सडकों पर
शिव भक्तों का रेला था
सोम रस मेंडूबा वो तो
भीड के बीच अकेला था।
चेहरे पर जो नजर पडी
भाव मुझे ऐसा लगा
लोग व्यर्थ भाग रहे हैं
मैं तो राजा सा पडा।
कितनी चिन्ता करते हैं ये
किसलिये ये दौड भाग
ऐसे वेचैन दीखते हैं
ज्यों पिछवाडे लगी हो आग
सौ की बोतल पी के
ऑउट ऑफ वर्ल्ड हो जाता हूं
घर बाहर किसी से भी
कोई मतलब नहीं रखता हूं।
शिव तो नहीं हूं कि पत्नी
भांग धतूरा घोट देगी
घर बाहर नाग बसहा
सब को अकेले देख लेगी।
समझता नहीं कोई मेरी बात
पागल विक्षिप्त समझते हैं
दीन हीन तुच्छ समझते
नित अवहेलना करते हैं
चाहे जो भी करें मुझे क्या
मैं तो मस्त मौला हूं
अपनी प्यारी बोतल संग
जी रहा अकेला हूं ।
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