अति सुहावनी ऋतु आई
पत्तों पर से धूल हटे
पादप ,पौधे,वृक्ष सारे
धुल कर बने हरे हरे।
सूरज दादा लेकर जाते
जलाशय से काला बादल
घुमा घुमा कर लौटा देते
सूद समेत आज या कल।
सद्यःस्नाता सी अमराई
और अधिक निखर आई
नीचे चलने वालों को
जल कणों से सींचती रही।
दूर दूर तक धरती फैली
हरा भरा उसका आंचल
देखो बादल ने भर दी
उसकी गोद उसका आंचल।
रसा रस को पी पी कर
वसुधा बनती जाती है
रंग विरंगे फूल पौधों में
अपना रूप दिखाती है।
बुझी प्यास धरिणी की
कण कण तृप्त हो गया
जीव जन्तुओं के लिये
पाताल में संचित किया ।
आते ही वर्षा धरा ने
धानी चूनर ओढ लिया
लगा उसे मानों इसनें
उसका ही स्वागत किया ।
धानी चूनर पर ओस की बूंदें
मोती जैसी दिखती हैं
अम्बर की छाया भी उसमें
प्रतिबिम्बित होती रहती है।
सारे जीव हुए आनन्दित
नव जीवन फिर से छाया
जग के सारे जड चेतन में
पसर गई हरियाली माया।
मानों त्यौहार हो आया
भींगें भींगे वृक्ष झूम रहे
प्रकृति मां की उदारता पर
नख शिख तक पूर्ण हुए।
विद्या
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