दोनों सदभाव हैं मन के
मगर दोनों में अंतर है
क्षेत्र एक का संकीर्ण है
दूसरे का अति विकीर्ण है।
श्रद्धा सच पर व्यापक निष्ठा
ईश्वर ,गुरू,श्रेष्ठ ज्ञानी पर
अटूट विश्वास प्रगट करना है
जग कल्याण भरे प्राणी पर।
श्रद्धा सागर सा उमगता
सृष्टि को मिलाना चाहता
सबको अपने श्रद्धेय का
भक्त बनाना चाहता है।
दशों दिशाएं धरा गगन
करते रहें उनको नमन
भाव इनका बढता रहे
उदधि सा उमगता रहे।
प्रेम एकाधिकार चाहता
प्रेमी का पूर्ण आकर्षण
किसी की नजर न पडे उसपर
उस पर हो पूर्ण नियंत्रण।।
उसका अपना पन निरंकुश
किसी अन्य का नहीं प्रवेश
अगर कोई आ जाता है
बिगडता सारा परिवेश।
करता प्रेम निःस्वार्थ समर्पण
चाहे अटूट अपना पन
खलल डालने वालों को
विनष्ट करना चाहता मन।
प्रेम निर्मल जलधारा है
दो पाटों के बीच नियंत्रित
बिना शर्त समर्पण चाहे
अप्राप्य हो तो होता व्यथित।
ये दोनों सदभाव मन के
दोनों दो मार्ग पर चलते
विपरीत दोनों की गति है
विचित्र दोनों की मति है।
विद्या
——////——////——////——-/////——-////——////——
टिप्पणी करे