किसी अनजान क्षण में
जन्म लिया धरणी पर
उसके पहले का कुछ भी
पता नहीं ,थी कहां पर ?
क्या थी ,कहां थी ,क्यों थी
पुनरपि जन्मम की तर्ज पर
कितनी बार आई गई हूं
कितना भटकी अवनि पर ।
अब इस योनी के बाद
रज में मिलने के बाद
कहां ,कहां जाना होगा
कौन नया फसाना होगा ।
कुछ भी नहीं जानते हैं
जन्म और मृत्यु के बीच
का समय हमारा है
ज्यों नदी दो पाटों के बीच।
नहीं पता वो भी हमारा है
या नहीं, जो रिश्तेदार मिले
संयोग से मिले या सच में
अपने ही होकर मिले ।
समय समुद्र में बहते ,बहते
जैसे काठ के टुकडे हों
मिलते बिछुडते जा रहे हैं
सब अपने या पराये हों ।
गम नहीं है किसी से कम
फिर भी जीवित हैं हम
महसूसते अपार पीडा
दुनिया का लिया है बीडा।
संसार की रंगीन आभा
चमकती लालसा बढाती
उसी में डूब डूब रहना
कामनाओं को बढाते रहना ।
इधर पीडा उधर आकर्षण
भ्रमित चकित हमारा मन
जीवन की इस कुहेलिका में
व्यथित मन विचलित तन ।
जब तक ये रहस्य छटेगा
अपना शरीर ही नहीं रहेगा
पाप पुण्य के गणित में
ऊभ चुभ ऊभ चुभ करेगा ।
विद्या
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ही
र
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