vidus

Eternal Learner

“अकेलापन”

भीड में अकेले है हम

विजी अपने गम के संग

भरा पूरा परिवार बेकार

मोबाइल में डूबे प्रति क्षण ।

पति,पत्नी, बाल,बच्चे

अपने मोबाइल ही में फंसे

चुस्त दुरूस्त रूटीन के बीच

पूछ न पाते हम हैं कैसे।

पूरी कृत्रिमता आई नहीं

पर खा गई संवेदना सभी

अपना कौन पराया का गणित

उलझा है हम होरहे भ्रमित।

किसी को भाता किसी को नहीं

अकेला पन सताता सबको सही

सामाजिक प्राणी असामाजिक बने

राग रंग अकेले में होता नहीं।

खो गया हमारा परस्पर व्यवहार

मिलना रोज रोज बिना विचार

था अपना पराया में अंतर नहीं

जब मन हो घूम आते कहीं।

अभी तो डर है कब क्या बात करें

पता नहीं किस चीज का टाइम है

होगा फ्री तभी तो देगा जबाब

नहीं तो कॉल करना क्राइम है ।

अकेलापन सालता है अंदर तक

चिंतन,मनन सब चलता हर पल

किसको सुनायें मन की व्यथा

जीवन की आपाधापी औ कथा।

मन मस्तिष्क का कोश है भरा

अभिव्यक्ति की इच्छा बडी

अपनी बातें बतायें किसको

पकड के पास बिठायें किसको।

फोन से ही पूछ लेना हाल चाल

कठिन है जानना दूसरों का हाल

अपने अपने रास्ते चल रहे सब

लाभ ही की बात करेंगे अब ।

कहां से कहां तक आई दुनिया

कहां जायेगी मुश्किल है कहना

पारस्परिकता हो रही बेकार

कैसे भी यहां अकेले ही रहना।

विद्या

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