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Eternal Learner

“समाज की बुनावट”

बदलती रही बुनावट समाज की

जाति ,पाति ,कुल ,गोत्र बदले

खिचडी पक गई अनेक अनाज की

हर वर्ग के सारे ढांचे बदले।

तन्तु के जालों सी बुनावट

में बहुत अंतर आया है

पुरानी संरचना को छोड

इन्द्रधनुषी रंग छाया है ।

भेडिया धसान की भांति

हम आंख मूंद चलते रहे

अंधेरी गुफा में बढते बढते

आज कहां तक पहुंच गये?

ज्यों लाल, हरा ,नीला,पीला

मिलकर हजारों रंग बनाते हैं

त्यों मानव योनि के न जाने

कितने ही प्रकार बन गये?

धर्म कर्म घालमपेल हुआ

वंश ,परम्परा,औ संस्कार

नियम ,परिनियम बदल गये

बदले पूजा पाठ व्यवहार।

एक रंग विदेशी चढ गया

यहां के समस्त वर्गों में

वेश ,भूषा ,खान,पान में

उठने,बैठने,बोलने के ढंग में।

एक द्वन्द चल रहा यहां के

दोनों पीढी के बीच में

पुराना अच्छा नया खराब

दुनिया जा रही कीच में।

आपकी बात न मानेंगे दद्दू

आपका जमाना चला गया

देखिये आप आज की दुनिया

में आये कितने रंग नया।

ढेरों बच्चे पैदा करके

समाज में छोड देते थे

पढे लिखें या मूर्ख रहें

चिन्ता ही नहीं करते थे।

हम पहले पैदा ही न करेंगे

करेंगे भी तो एक या दो

गुड डाल कर ईख रोपेंगे

अपने मन माफिक होंगे वो ।

नित नूतन आविष्कारों से

सारे परिचित हो जायेंगे

अगर नहीं तो हमारे बच्चे भी

जाहिल ही कहलायेंगे।

परिधि बढी रिश्तों की

देश विदेश सारा संसार

नई नई परम्परा अपनाते

किये बिना अधिक विचार।

विद्या

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