भौतिक हो या व्यक्तिगत
बाउंडरीज रोज बदलती हैं
हलचल होती रहती हर पल
कभी टूटतीं कभी फैलतीं हैं।
विश्व के हर देश की सीमा
निर्धारित किया गया ग्लोब में
परस्पर युद्ध कर कर के हम
तोडते मिलाते अपनी सीमा में।
एक ही धरती है प्यारी
जहां हमारा रहना होता
पर नियंत्रण रेखा पर हरपल
अपनी सेना को रखना होता ।
प्रकृति ने बांट रखा है
भूमि ,जंगल ,नदी ,पहाड
अपनी सुविधानुसार बांटते
लड झगड करते काटमार।
घर द्वार हो या खेत खलिहान
आगे पीछे बढाते रहते
दूसरे की भूमि हडपने के लिये
अपनी बुद्धि लगाते रहते।
जहां घुसकर बैठते थे
हो गया अंदर जाना मना
क्यों रिश्तों में कडवाहट आई
भ्रम ग्रन्थि क्यों पसरी इतना ।
जलाशय में ज्यों पत्थर फेंके
उठ उठ भंवर पसरती जाती
गोल गोल चक्कर खाते खाते
दूर से दूर निकल जाती।
मानव सम्बन्ध भी वैसे ही
दायरा बदलते ही रहते
कल तक जो थे अपने
आज पहचान नहीं पाते।
पलछिन पलछिन काल सरकता
दिन प्रतिदिन समय बदलता
तोड फोड कर सब सीमाएं
मानव अगाध गति से चलता।
विद्या
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yes
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