भाव घटते बढते हैं
समय समय पर चीजों के
पावर के मिल जाने पर
बढ जाते भाव व्यक्ति के ।
एक भाव मूल्य है भाई
दूसरा मानसिक बडप्पन
दोनों में हलचल है आज
सुखद कैसे चले जीवन।
मूल्य के अलावे इसके
अनेक बहुरंगी अर्थ हैं
भावुक जन भाव में डूबते
बढे भाव वाले समर्थ हैं।
बडा पद मिलने के बाद
भाव उसका बढ जाता है
अपना महत्व दिखा दिखा
अहंकार से भर जाता है।
भक्ति भाव में डूबा मन
नर में नारायण देखता
पत्थर काठ की मूर्ति में भी
ईश्वर दर्शन कर लेता।
सडक छाप लीडर से वे
ज्यों ही मंत्री बन जाते हैं
बढ जाता है ताम झाम
पहचानने भी नहीं लगते हैं।
बाजार के भाव भी यहां
उतरते चढते रहते हैं
शेयर मार्केट में तूफान
बवाल मचाते रहते हैं।
किसी कविता के भाव हमें
तभी समझ में आते हैं
जब उसके अंदर छिपे
रस को सही समझ पाते हैं ।
जैसा परिवेश होता है
मन के भाव बदलते हैं
चोरों के मन में कभी
भक्ति भाव न पनपते हैं।
नव रस के सारे रूप यहां
मन के अंदर ही रहते हैं
सही समय पर अवसर पा
अनुकूल हो निकलते हैं।
अवकाश ग्रहण करने के बाद
फ्यूज बल्ब से हो जाते हैं
अफसर हो या चपरासी
भाव विहीन हो जाते हैं ।
विद्या
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