तन की थकन जारी है
इस टेढी मेढी राह पर
जीना भी लाचारी है
इस टेढी मेढी राह पर।
जीना सांस को बोझ समझ
मन की लाचारी है
फिर भी जिये जा रहे
इस टेढी मेढी राह पर।
बचपन बीता यौवन बीता
अधेडावस्था भी निकल गया
बन गया अभिशाप बुढापा
इस टेढी मेढी राह पर।
कणों का जमघट यहां
क्षणों में ही जीना है
सुख ,दुख,हर्ष ,विषाद ले
इस टेढी मेढी राह पर।
गुजरती जाती जिन्दगी
जीने के ढंग बदलते हैं
उतार चढाव झेलते
इस टेढी मेढी राह पर।
कभी सफल कभी असफल
कभी ऊपर कभी नीचे
होते होते आ रहे हैं
इस टेढी मेढी राह पर।
भूमिका बदलती रही
जीवन के रंगमंच पर
अभिनय करते जा रहे
इस टेढी मेढी राह पर।
बाबू ,बेबी,बेटी से
पत्नी ,प्रेयसी,मां बनी
अब दादी नानी बन गई
इस टेढी मेढी राह पर।
दुनिया रंगमंच बना
गजब नाटक चल रहा
जैसे तैसे जी रहे
इस टेढी मेढी राह पर।
विद्या
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