देवशयनी दिन विष्णु सोये
भोले शंकर जग गये हैं
उनकी पूजा में भक्त गण
मन प्राण से लग गये हैं ।
वम भोले सपरिवार हैं
बैठे मंदिर के अंदर
दरवाजे पर बैठे हैं
नंदी ह्रृष्ट पुष्ट काया लेकर।
उनके कानों में कहने को
भीड लगती बहुत भारी
अपने काम को करवाने हेतु
भक्तों की है लाचारी।
धीमी चलती मनु पंक्ति जब
अचानक थम सी जाती है
फुस फुस वाली आवाज में
बातें बोली जाती हैं।
फरियाद सुनने का दायित्व
दे दिया है शिव शंकर ने
स्थूल काया एवं बुद्धि ले
तत्पर हैं बसहा मंदिर में।
सोचती अनगणित आवेदन
कैसे वे स्मृति में रखेंगे
भक्तों की भावनाओं को
कैसे उन तक पहुंचायेंगे।
मोटी ही बुद्धि है इनकी
वो कहानी तो ज्ञात है
बाबा ,बसहा की बातें
पूरे जग में विख्यात है।
बाबा ने भेजा था संदेश
बसहा वरद को कह कर
सौ दिन स्नान एक दिन भोजन
बता दो नियम ध्यान लगा कर।
आते आते धरती पर
नंदी बाबा विस्मृत कर गये
सौ दिन भोजन एक दिन स्नान
का नियम बता ऊपर गये।
माथा ठोक लिया शंभु ने
ये क्या कर दिया तुमने
इतनी बार खाने हेतु
जाओ तुम अन्न उपजाने।
जाओ हल चलाओ उनके
सुख दुख में भी साथ रहो
भक्त जनों की रक्षा के लिये
धरा पर भी तैनात रहो।
जैसे मेरी सेवा करते
कुछ नहीं सोचते तुम
वैसे ही वहां भी करना होगा
तभी प्रसन्न होंगे हम।
ऐसे भुलक्कड नंदी जब
ढेरों याचनाएं पाते हैं
पता नहीं कैसे सबको
वमभोले तक पहुंचाते हैं।
फिर भी छोडते नहीं हम
धक्कम धुक्की झेल कर भी
उनके कान में बिना बोले
मंदिर से लौटते ही नहीं ।
विद्या
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