दोनों तो दो बातें हैं
एक प्रशान्त दूसरा उदभ्रान्त
एक मन को शान्त करता
दूसरा कर देता अशान्त।
घृत पडती अग्नि की भांति
लालसा लहकती रहती
और,और,और चाहिये
इसी कामना संग बढती।
हजार,लाख,करोड,अरब,
खरब,नील,पद्म,असंख्य,
जितना भी मिलता जाये
लेते रहेंगे हम निःशंक।
कल्पना असीम संपदा की
महालक्ष्मी देती जातीं
लालच बढाते हुए वो
खजाना लुटाती जाती।
चंचला हैं वो टिकती नहीं
घूमती रहती हर कहीं
अहंकार बढा देती हैं
जल्दी ही गिरा देती हैं ।
पूर्वज दें या अर्जन करें
बच्चे कमायें ,छल से पायें
त्याग ,भोग नहीं करते तो
सर्वनाश निश्चित हो जाये ।
शान्ति संतोष से मिलेगी
प्रलोभन की अग्नि थमेगी
सच्चाई के मार्ग पर चल
मन प्राण को चैन मिलेगा ।
जबतक त्याग न सीखेंगे
संतोष कभी न आयेगा
शान्ति तो नहीं ही मिलेगी
मानव बैठ पछतायेगा ।
शान्ति, संतोष धन है मन का
वेचैनी उलझन से बचाता
सौ हों या हों महा संख्य
यहीं रह जायेंगे बताता ।
ये हम पर है क्या करें
त्याग करें ,ध्यान हटायें
शान्ति ,संतोष को पकडे या
श्री सागर में विचरण करें।
विद्या
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