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Eternal Learner

“ब्रह्मा का दुख”

सृजन कर्ता सृष्टि के

जन की किस्मत के लेखक

पोथी भरते रहते सबके

भाग्य अंक को लेकर ।

अपनी पोथी लेकर वो

माता भवानी गृह आये

पटक कर उनके सामने

अपना दुखडा सुनाये।

देखें भवानी आप अपने

बम भोले की करतूत

मैं विचलित हूं दुखी भी

देख कर उनकी ये रीत ।

कौतुहल से पूछा मां ने

क्या हुआ मुझको बतलायें

तंग हूं इनके पुत्रों से अब

इनकी क्या समस्या लाये।

पोथी खोल कर बोले वो

देखें इतना मार काट

जो लिखता हूं काटना पडता

शिव शंभु के वरदान के बाद।

जिसको शून्य दिया है मैंने

उसको स्वर्ण कलश दे देते

काट काट कर लिखना पडता

ये आडी तिरछी रेखाएं देखें।

पूरी पोथी गंदी हो रही

मैं बहुत ही परेशान हूं

इनके औघडपन के कारण

बहुत ज्यादा हैरान हूं।

बार बार लिखा पढी अब

काटम काट नहीं करूंगा

इस कार्य से छुट्टी दे दें

भीख मांग कर खा लूंगा।

माता ने बाबा को देखा

प्रश्न वाचक दृष्टि से

क्या करूं क्या कहूं मैं

आप ही बता दीजिये।

मैं तो ऐसा ही हूं ,रहूंगा ,

अनंत काल तक भी ऐसे ,

जो भी करना पडे इनकों

करते रहें जैसे तैसे ।

खुला दरबार है बाबा का

मनचाहा वरदान देते

जो मांगते वही मिल जाता

भर भर झोली लेते रहते।

विद्या

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