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Eternal Learner

“शिव पार्वती का अनुराग”

मां पार्वती संग देवाधिदेव

उसी कैलाश पर बैठे थे

दिन चर्या चल रहीथी नित्य की

सारे अपने कर्म में रत थे।

माता ने मनुहार किया पुनः

अपने नटराज शिवशंकर से

नट का वेश धर आप कृपया

कर ही दें मनोरंजन फिर से।

नट वेश में डमरू बजाते

आप अत्यंत मंगलकारी लगते

जो भी दर्शन कर लेता है

उसके तो परम भाग जगते।

कहा शिव ने ,आपने जो कहा

वो तो एकदम ठीक ही है

पर सोचता हूं इससे हम

सब किस प्रकार बच सकते हैं।

मेरे नर्तन से प्रलय आयेगी

इस प्रकार से समझ लें आप

सारा कुछ उथल पुथल होगा

देते रहेंगे हम डमरू पर थाप।

ऊपर चांद से अमृत झरेगा

मेरा बाघम्बर बाघ बनेगा

फिर वो बसहा को खा लेगा

उसको कौन बचा पायेगा।

थिरकन से जटाएं बिखरेंगी

गंगा सहस्त्र मुख हो बहेंगी

उदधि जल से उमडने लगेगा

प्रलय काल भी आ जायेगा ।

ये मेरे अलंकार सपोले

फिसल फिसल कर गिरेंगे

देख उन्हे कार्तिक के मोर

उसे निगलने को लपकेंगें।

मेरे मुंडों की माला टूटेगी

सारे कंकाल रूप धर लेगा

डर से आप भाग जायेंगी

मेरा नाच कौन देखेगा ?

इतने तर्क सुन माता गौरा

मन ही मन मुस्काने लगीं

समझ गई मैं मन मौजी आप

बेकार ही मैं कहने गई ।

जब जब मन हो तब ही नाचें

उस समय तो प्रलय नहीं होगी

तभी देख लूंगी मैं आनंद में

कोई बिडम्बना नहीं होगी ।

विद्या

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