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“शिव परिवार में युद्ध”

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पार्वती पुत्र गणेश बने थे

द्वारपाल माता के घर के

जबतक मां स्नान करेगी

कोई न अंदर आने पाये।

उनकी आज्ञा सर्वोपरि थी

गणेश के जांच की घडी थी

शस्त्र ले तैनात हो गये

सजग नजर राह पर टिकी थी ।

होनी कोई टाल न पाये

जो होना है होता जाये

देवता, दानव ,नर,किन्नर

सारे इसकी जद में आये।

शिव शंकर अपरिचित थे इनसे

माता ने अपने से गढा था

दरवाजे पर उन्होंने देखा

एक तेजस्वी बालक खडा था।

अंदर वो जाने लगे धुन में

कुछ कुछ चिंतन करते मन में

बालक ने आगे बढ रोका

गंभीर स्वर में उनको टोका ।

कहां जा रहे अपनी धुन में

क्या सोचते जा रहे मन में

अंदर किसी को प्रवेश नहीं है

माता का आदेश यही है।

क्या मतलब अपने घर जा रहा

है तू कौन अडंगा लगा रहा

मेरा घर मैं ही न जाऊं

बोलो किससे आज्ञा पाऊं ।

बोला बालक मां की आज्ञा

से ही आपको रोक रहा हूं

आदेश का पालन कर रहा

अधिकार से ही टोक रहा हूं ।

क्रोध में शिवशंकर आये

गणों को समझाने पठाये

लेकिन बालक बडा हठी था

ऊपर से वो महा बली था।

उनसे युद्ध होने लगा भयंकर

वीर बालक लेता था टक्कर

सारे शिव गण मुंह की खाये

समाचार जाकर कह आये।

त्रिशुल ले बम भोले आये

अपने कुछ शस्त्र आजमाये

कुछ पल युद्ध उनसे भी हुआ

उसकी निपुणता देख चकराये।

बडा भयंकर है ये बालक

देवी ने कहां से पाया है

ये अंदर नहीं जाने देगा

इसको पूरा हटाना होगा।

गुस्से के अतिरेक में आकर

काटा सिर त्रिशूल चला कर

बालक तो गिर गया भूमि पर

मच गया हाहा कार भयंकर॥

माता सुनकर कांपने लगी

संसार के विनाश हेतु उठी

घबराये शंकर ने मनाया

इतना रूष्ट न हो महा माया ।

प्रलय न मचाओ बसुन्धरा पर

बालक तुमको देता लाकर

सिर इसका मैं लगवा दूंगा

पुनःइसको जीवित करूंगा।

यूं प्रलाप थोडा थमा मां का

धीमें धीमें सिसकती रहीं

पछताने लगी मन में

क्यों निषेध की बात कही।

दिया आदेश शिव शंभु ने

नव जात शिशु का सिर लाने

कोई नया मस्तक लगेगा

इस बालक को जीवित करने।

दौडे गण गज छौना का सिर

मिला काटकर ले आये

संजीवनी विद्या का प्रयोग कर

बालक के धड पर लगाये।

शिव महिमा बालक उठ बैठा

मां के प्राण में प्राण आया

करके माता पिता को नमन

गणेश गजानन कहलाया।

महाबली ,युद्ध विद्या निपुण पुत्र

पा माता पिता दोनों खुश हुए

बल ,विद्या,तीक्ष्ण बुद्धि ,वैभव का

गणपति को शुभ आशीष दिये

विद्या

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