दादा के टाइम का वो
शान शौकत गायब हुआ
अपनी डफली ,अपना राग
पूरे घर में बजने लगा।
थे आंगन में घर दो तरफ
दो तरफ मिट्टी की दीवार
उसमें सुख से रहता था
दीमक ,जोंक का परिवार ।
नेनुआ,कद्दू,झिंगली,लता
चढे हुए थे उस छप्पर पर
तोते का पिंजडा रहता
ओसारे पर खूंटी पर ।
चीरा मीरा की क्यारी
नीले ,पीले फूलों से भरी
सिन्दूर लगा तुलसी
चौरा सजती भरी भरी।
एक ओर पत्थर पर मांजा
जाता था सारा वर्तन
राख सर्फ से रगड धो
चमकता रहता था चम चम।
दूसरी ओर कन्तरी कपटी में
दाना पानी रखे जाते
जिसमें खा पीकर पक्षी गण
गुटुर गूं ,चीं ,कांव ,करते।
गाय ,कुत्ता ,बिल्ली ,गिलहरी
आ आ कर खाते रहते
सबसे मिल जुल कर रहना
दादा जी कहते रहते।
ऐल फैल आंगन बंट गया
छोटे छोटे टुकडों में
घर बना ताला लटका के
रखा है सब भाईयों ने।
खिडकी से आने वाली
फुर फुर कर शीतल हवा
बीते दिनों की बात हुई
इसकी कहीं नहीं है दवा।
काल बदल देता है सबकुछ
गांव शहर बनते जा रहे
आंगन का कंसेप्ट खत्म है
कमरे कमरे होते जा रहे ।
अब बरी,पापड,तिलौरी
अमावट ,खटाई चैता
कहां सुखायेंगी सखियां
कैसे वे देंगी न्योता।
मिट्टी गोबर की सोंधी गंध
कभी नहीं मिल पायेगी
ईंट सिमेंट वाली जमीन
पानी से ही धुल जायेगी।
दादी का घर बिलख रहा
मेरे टुकडे तो कर दिये
रहते क्यों नहीं यहां पर
शहर रहने क्यों चल दिये ?
विद्या
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