vidus

Eternal Learner

“आ जाओ फिर से कृष्ण”

चौंसठ कलाओं से

जग को लुभाते हो

जैसा युग बदलता है

वैसा बन जाते हो।

सैकडों जन में

एक को बचाते हो

भस्म सब हो जाता

गीता बचा लेते हो।

सिद्ध कर दिया तूने

तू ही सर्व व्यापी है

तेरे विराट रूप में ही

जगत समाया है।

मानव समझता नहीं

आपस में झगडता है

तू ही सब करता है

तूही सब पाता है।

ब्रहमांड के अंदर तू

तू ही इसके बाहर है

जल ,थल,नभ सबमें

तू ही तू छाया है।

तेरा नटखट बचपन

स्नेहिल जवानी तेरी

सारथी बन तूने

गीता सुनाया है।

उठाया था गोबर धन

जिस छोटी उंगली पर

उसी छोटी उंगली से

सुदर्शन चलाया है।

किया नर्तन तूने

कालिय के फन पर

फिर से नाचो नाथ

आज के नागों पर।

विनती करती तेरी

करबद्ध हाथों से

आ जाओ फिर से कृष्ण

जग त्राण हरने को ।

मेरा कनु गोविन्दा

मोहन वंशी वाला है

लीला पुरूषोत्तम है

छलिया न्यारा है।

विद्या

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