उन्नीस सौ पचास ई में
दादी के घर रहते थे
जो कुछ भी अभाव था पर
मस्ती में दिन कटते थे।
सुबह, सुबह सखियों संग
दिशा मैदान को जाना
खेतों में घूम घूम कर
साग तोडते घर आना ।
फिर जाना चाची के घर
आग मांगने के लिये
उपले पर आग का टुकडा
चुल्हा जलाने के लिये।
गैस वैस लाइटर फाइटर
का नाम भी नहीं जानते थे
दिया सलाई भी सब लोग
अपने घर में नहीं रखते थे।
जाते स्कूल गांव में ही
वस्ता ,चट्टी,बोरा लेकर
खुश होते थे गुरूजी को
शनिश्चरा पैसा देकर।
एक अधेली में भर पेट
जलेबी आ जाती थी
खुश होते थे जब गुरूआइन
मुझसे ही मंगवाती थी।
दो जलेबी मिलती मुझको
मिल बांट कर खा लेते
फिर कभी मंगवायेगी
बेसब्री से इंतजार करते।
रटा रटा कर पहाडा
गिनती याद करवा देते
जो नहीं करता याद उसे
मोगली बान चढा देते।
“राडं एडं पवित्रम “ये
कहावत लागू था
“दो थप्पडम कन मुचरम”
तो मिलता ही रहता था ।
बबुआ डबुआ खेलते थे
भादो के महीने में
ढोल बजाते घर घर जा
व्यस्त सीधा मांगने में।
सीधा होता दाल ,चावल
तरकारी,नमकऔर हल्दी
गुरू जी के लिये जमा करते
सारी सखियां जल्दी जल्दी।
डलिया में ले गणेश मूर्ति
गुरू जी संग सब चटिया
ढोल ,झांझ ,मजीरा लेकर
घूमते थे गलियां ,गलियां।
आंगन में पहुंच सब गाते
“बबुआ रे बबुआ लाल लाल डबुआ
आंख लाल होलो रे बबुआ “
दान उनसे खुशी खुशी ले लेते।
जहां कुछ भी नहीं मिलता
गाते थे हम सब मिलकर
“श्री गणेश को लिया उठाय
छूछे छूछे ही दिया भगाय ।”
वैसी पढाई सेवा कर के
बहुतेरे चटिया अफसर बने
याद आते हैं वे दिन
कैसे कैसे थे बने ठने।
विद्या
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