Eternal Learner

“कल की चिन्ता”

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कल क्या होगा ?कौन जानता ?

काल की गति को पहचानता

क्या मिलेगा तो खुश होंगे

ये भी समझ नहीं आता ।

कल की चिन्ता में डूबा जग

क्या क्या लूटें क्या बटोर लें

अभी जो खा पी लें हम

पीढ़ियों हेतु जमा कर लें ।

करनी पड़ें क्यों न बेईमानी

ठगना पड़े दूसरों का धन

जितना भी जमा होता जाता

संतु्ष्ट कभी न होता अपना मन ।

आकांक्षाओं की ढेर लगी है

बारी -बारी पूरा करते जाते

न वे घटते न प्रयास घटता

दिन तो आगे बढ़ते जाते।

बडा ही बेईमान है भविष्य

आकर्षण बढ़ाते रहता है

जगमगाते भविष्य दिखा दिखा

सबको भरमाते ही रहता है।

अब जमा राशि ज्यों ज्यों बढती

ये लक्ष्य बढता ही जाता है

थमेगी कहाँ जाकर सीमा

कोई कहाँ समझ पाता है।

क्या होगा कल कौन जानता ?

प्रकांड विद्वान आये गये

कल की अनिश्चितता के कारण

धूल धूसरित अभिमान हुए।

हम जो सोचें वो भी सोचे

ऐसा तो कभी न हो सकता

कठपुतली हम नाच हमारा

अपने मन से हो नहीं सकता ।

कोई चिन्ता नहीं करके हम

काल प्रवाह में बहते चलें

रखें विश्वास परम पिता पर

संपूर्णतःसमर्पित होते चलें ।

विद्या

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