Eternal Learner

“दमयंती काकी”

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उधर ,उधर ,उधर ही रहो

इधर मत आ जाना तुम

मेरे जल के कलश को

गलती से नहीं छूना तुम।

दमयंती काकी इसी तरह

ओसारे पर चिल्लाती थी

खेती करने वालों को

दूर से ही हडकाती थी।

जानते थे सब उनकी

ऐसी ही हालत सब दिन

चुप कर नहीं बैठ पातीं हैं

शोर मचातीं रहतीं हर दिन।

छुआ छूत का भूत उनपर

ऐसे ही चढा रहता था

बच्चों का झुंड भी उनका

मजाक उडाया करता था।

नाक पर मक्खी न बैठे

ऐसी उनकी सफाई थी

हाथ पांव धोते धोते

पानी खा गया चमडी थी।

पवित्र समझती अपने को

अलग थलग देवता तुल्य

बाकी सबको अति तुच्छ

कुत्ता बिल्ली पशु तुल्य।

अकेली थी घर में वो

एक बार बीमार पडी

दीखने लगा स्वर्ग द्वार

टूट गई हिम्मत की लडी।

मरने नहीं देना है मालकिन को

जल्दी शहर पहुंचाना होगा

वहां के डॅाक्टर से इनका

अच्छा इलाज करवाना होगा।

छुआ छूत वाली काकी को

सबने ठेले पर लिटाया

बस में ले जाने के लिये

गांव से सडक तक पहुंचाया।

वेहोश काकी के मुंह में

पानी डालते गये वे लोग

जीवन रक्षा के लिये किये

अपने जानते सब उद्योग।

शहर जाकर आई काकी

दवा इलाज से ठीक होकर

पानी पीने की बात सुन कर

कहने लगीं वो हंस कर ।

जो भी किया उन लोगों ने

वो तो उचित ही था

प्राण बचाने वालों को तो

ऐसे भी बहुत पुण्य होता।

मैं ही थी गलत इनसे भेद

बहुत ही करती रहती थी

मानव को मानव न समझती

बहुत गलती करती थी।

पडी बीमार पर सीख मिली

बहुत बडी जीवन में मुझको

समझना चाहिये समान सबको

तुच्छ नहीं समझना किसी को।

विद्या

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ऐसे भीबहुत पुण्य होता।

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