vidus

Eternal Learner

“टुकडे”

इसी में रातें गई

इसी में दिन गये

हम अपनी दिनचर्या

की धूरी पर नाचते

नाचते जीवन का चक्र

पूरा करते रहे।

सृष्टि के सारे जीव

एक एक पिंड हैं

अलग अलग जैसे

एक लोटा जल

असंख्य बूंदों में बदल सकता है

उसी तरह हम सब

ब्रह्म के अंश के

बिखरे टुकडे हैं।

विद्या

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